जागरण का तेल + प्रेम की बाती = परमात्मा का प्रकाश (प्रवचन—उन्नीसवां)
सारसूत्र:
चंदन कार वापि उप्पल अथ वस्सिकी।
एतेसं गंधजातान सीलगधो अनुत्तरो।।49।।
अणमत्तो अयं गंधो’ या यं तगरचंदनी।
यो च सीलवतं गंधों वाति देवेतु उत्तमो।।50।।
तेसं संपन्नसीलान अप्पमादविहारिनं।
सम्मदज्जा विमुत्तानं मारो मागं न विदति।।51।।
यथा संकारधानस्मिं उज्झितस्मिं महापथे।
पदुमं तत्थ जायेथ सुचिगंध मनोरमं।।52।।
एवं संकारभूतेसु अंधभूते पुथुज्जने।
अतिरोचति पज्जाय सम्मासंबुद्धसावको।।53।।
सिवा इसके और दुनिया में क्या हो रहा है
कोई हंस रहा है कोई रो रहा है
अरे चौंक यह ख्वाबे-गफलत कहां तक
सहर हो गई है और तू सो रहा है
निद्रा है दुर्गंध। जाग जाना है सुगंध। जो जागा, उसके भीतर न केवल प्रकाश के दीए जलने लगते हैं, वरन सुगंध के फूल भी खिलते हैं। और ऐसी सुगंध के जो फिर कभी मुरझाती नहीं। सदियां बीत जाती हैं, कल्प आते हैं और विदा हो जाते हैं, लेकिन जीवन की सुगंध अडिग और थिर बेनी रहती है। नाम भी शायद भूल जाएं कि किसकी सुगंध है, इतिहास पर स्मृति की रेखाएं भी न रह जाएं, लेकिन सुगंध फिर भी जीवन के मुक्त। आकाश में सदा बनी रहती है।