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मंगलवार, 24 मार्च 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन- 10) (भाग 1)


देखा तो हर मुकाम तेरी रहगुजर में है—(प्रवचन—दसवां)





पहला प्रश्न:



भगवान, एक ही आरजू है कि इस खोपड़ी से कैसे मुक्ति हो जाए? आपकी शरण आया हूं।


पूछा है चिन्मय ने।
खोपड़ी से मुक्त होने का खयाल भी खोपड़ी का ही है। मुक्त होने की जब तक आकांक्षा है, तब तक मुक्ति संभव नहीं। क्योंकि आकांक्षा मात्र ही, आकांक्षा की अभीप्सा मन का ही जाल और खेल है। मन संसार ही नहीं बनाता, मन मोक्ष भी बनाता है। और जिसने यह जान लिया वही मुक्त हो गया।

साधारणतः ऐसा लगता है, मन ने बनाया है संसार, तो हम मन से मुक्त हो जाएं तो मुक्त हो जाएंगे। वहीं भूल हो गयी। वहीं मन ने फिर धोखा दिया। फिर मन ने चाल चली। फिर मन ने जाल फेंका। फिर तुम उलझे। फिर नया संसार बना। मोक्ष भी संसार बन जाता है।
संसार का अर्थ क्या है? जो उलझा ले। संसार का अर्थ क्या है? जो अपेक्षा बन जाए, वासना बन जाए। संसार का अर्थ क्या है? जो तुम्हारा भविष्य बन जाए। जिसके सहारे और जिसके आसरे और जिसकी आशा में तुम जीने लगो, वही संसार है। दुकान पर बैठे हो, इससे संसार में हो; मंदिर में बैठ जाओगे, संसार के बाहर हो जाओगे--इतनी सस्ती बातों में मत पड़ जाना।
काश, इतना आसान होता! तब तो कुछ उलझन न थी। दुकान में संसार नहीं है, और न मंदिर में संसार से मुक्ति है। अपेक्षा में, आकांक्षा में, आशा में संसार है; सपने में संसार है। तो तुम मोक्ष का सपना देखो, तो भी संसार में हो।

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन-9) (भाग-1)

यात्री, यात्रा, गंतव्य: तुम्हीं—(प्रवचन—नौवां)





सूत्र:


मा प्रमादमनुयुग्चेथ मा कामरतिसंथवं।
अप्पमत्तो हि झायंतो पप्पोति विपुलं सुखं।।24।।


पमादं अप्पमादेन यदा नुदति पंडितो।
पग्भपासादमारुयूह असोको सोकिनिं पजं।
पब्बतट्ठो' व भूमट्ठे धीरो बाले अवेक्खति।।25।।



अप्पमत्तो पमत्तेसु सुत्तेसु बहुजागरो।
अबलस्सं' व धीघस्सो हित्वा याति सुमेधसो।।26।।



अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा।
सग्जोजनं अपुं थूलं डहं अग्गी' व गच्छति।।27।।


अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा।
अभब्बो परिहानाय निब्बानस्सेव संतिके।।28।।








ढूंढ़ता फिरता हूं ऐ इकबाल अपने आपको
आप ही गोया मुसाफिर आप ही मंजिल हूं मैं

रविवार, 22 मार्च 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन- 8) (भाग 1)

प्रेम है महामृत्यु—(प्रवचन—आठवां)



 

पहला प्रश्न:



दुनिया के ज्यादातर धर्मगुरुओं ने अपने स्त्री-पुरुष संन्यासियों को हो सके उतनी दूरी रखने के नियम दिए; पर आप हमेशा दोनों के प्रेम पर ही जोर देते हैं। क्या आप प्रेम का कुछ विधायक उपयोग करना चाहते हैं? या उसकी निरर्थकता का हमें अनुभव कराना चाहते हैं?
प्रेम को समझना जरूरी है।
 
जीवन की ऊर्जा या तो प्रेम बनती है, या भय बन जाती है। दुनिया के धर्मगुरुओं ने आदमी को भय के माध्यम से परमात्मा की तरफ लाने की चेष्टा की है। पर भय से भी कहीं कोई आना हुआ है? भय से भी कहीं कोई संबंध बनता है? भय से घृणा हो सकती है, भय से प्रतिरोध हो सकता है; लेकिन भय से मुक्ति नहीं हो सकती। भय तो जहर है, फिर परमात्मा का ही क्यों न हो।

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन- 7) (भाग- 1)

जागकर जीना अमृत में जीना है—(प्रवचन—सातवां)



अप्पमादो अमतपदं पमादो मच्चुनो पदं।

अप्पमत्ता न मीयंति ये पमत्ता यथा मता।।18।।


एतं विसेसतो भ्त्वा अप्पमादम्हि पंडिता।

अप्पमादे पमोदंति अरियानं गोचरे रता।।19।।


ते झायिनो साततिका निच्चं दल्ह-परक्कमा।

फुसंति धीरा निब्बानं योगक्खेमं अनुत्तरं।।20।।



उट्ठानवतो सतिमतो सुचिकम्मस्स निसम्मकारिनो।

सग्भ्तस्स च धम्मजीविनो अप्पमत्तस्स यसोभिङ्ढति।।21।।


उट्ठानेनप्पमादेन सग्भ्मेन दमेन च।

दीपं कयिराथ मेधावी यं ओधो नाभिकीरति।।22।।


पमादमनुग्भ्न्ति बाला दुम्मेधिनो जना।

अप्पमादग्च मेधावी धनं सेट्ठं' व रक्खति।।23।।


जफर ने गाया है--

उम्रे-दराज मांगकर लाए थे चार दिन

दो आरजू में कट गए दो इंतजार में

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन-6) (भाग-1)

'आज' के गर्भाशय से 'कल' का जन्म—(प्रवचन—छठवां)




पहला प्रश्न:


आपने स्त्री के लिए प्रेम और पुरुष के लिए ध्यान का मार्ग बताया। मेरी तकलीफ यह है कि न प्रेम में पूरा डूब पाती हूं, न ध्यान में गहराई आती है। कृपया बताएं मेरे लिए मार्ग क्या है?

धर्म ज्योति ने पूछा है।

धर्मगुरुओं का डाला हुआ जहर बाधा बन रहा है। उस जहर से जब तक छुटकारा न हो, प्रेम तो असंभव है। क्योंकि प्रेम की सदा से निंदा की गयी है। प्रेम को सदा बंधन कहा गया है। और चूंकि प्रेम की निंदा की गयी है और प्रेम को बंधन कहा गया है, इसलिए स्त्री भी सदा अपमानित की गयी है। जब तक प्रेम स्वीकार न होगा तब तक स्त्री भी सम्मानित नहीं हो सकती, क्योंकि स्त्री का स्वभाव प्रेम है।
और बड़े आश्चर्य की बात यह है कि स्त्रियां जितनी धर्मगुरुओं से प्रभावित होती हैं उतना कोई भी नहीं होता। और उनकी जड़ पर ही वे कुठाराघात किए चले जाते हैं।
लेकिन एक बार तुम्हारे मन में जहर फैल जाए, और ऐसा खयाल आ जाए कि प्रेम बंधन है, तो तुमने पुरुष की भाषा सीख ली। और हृदय तुम्हारा स्त्री का है। तब तुम अड़चन में पड़ो, स्वाभाविक है। पुरुष के लिए सही है यही बात कि प्रेम बंधन है। स्त्री के लिए प्रेम मुक्ति है। और जो पुरुष के लिए जहर है, वह स्त्री के लिए अमृत है। और स्त्री का तो अब तक कोई धर्म पृथ्वी पर पैदा नहीं हुआ, और स्त्रियों का तो कोई तीर्थंकर नहीं हुआ, और कोई अवतार नहीं हुआ; इसलिए स्त्री के हृदय की बात को किसी ने प्रगट भी नहीं किया।

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-5)-(भाग- 1)

बुद्धपुरुष स्वयं प्रमाण है ईश्वर का—(प्रवचन—पांचवां)




इध सोचति पेच्च सोचति पापकारी उभयत्थ सोचति।

सो सोचति सो विहग्भ्ति दिस्वा कम्मकिलिट्ठमत्तनो।।13।।

इध मोदति पेच्च मोदति कतपुग्भे उभयत्थ मोदति।

सो मोदति सो पमोदति दिस्वा कम्मविसुद्धिमत्तनो।।14।।


इध तप्पति पेच्च तप्पति पापकारी उभयत्थ तप्पति।

पापं मे कतन्ति तप्पति भीय्यो तप्पति दुग्गतिङ्गतो।।15।।



बहुम्पि चे सहितं भासमानो न तक्करो होति नरो पमत्तो।

गोपो' व गावो गणयं परेसं न भागवा सामग्भ्स्स होति।।16।।


अप्पम्पि चे सहितं भासमानो धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।

रागग्च दोसग्च पहाय मोहं सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो।

अनुपादियानो इध वा हुरं वा स भागवा सामग्भ्स्स होति।।17।।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन- 4)-(भाग -1)

अकंप चैतन्य ही ध्यान—(प्रवचन—चौथा)





पहला प्रश्न:



बुद्ध ने मन को जानने-समझने पर ही सारा जोर दिया लगता है। क्या मन से मनुष्य का निर्माण होता है? आत्मा-परमात्मा की सारी बातें क्या व्यर्थ हैं?

बातें व्यर्थ हैं। अनुभव व्यर्थ नहीं। आत्मा, परमात्मा, मोक्ष शब्द की भांति, विचार की भांति दो कौड़ी के हैं। अनुभव की भांति उनके अतिरिक्त और कोई जीवन नहीं। बुद्ध ने मोक्ष को व्यर्थ नहीं कहा है, मोक्ष की बातचीत को व्यर्थ कहा है। परमात्मा को व्यर्थ नहीं कहा है। लेकिन परमात्मा के संबंध में सिद्धांतों का जाल, शास्त्रों का जाल, उसको व्यर्थ कहा है।
मनुष्य इतना धोखेबाज है कि वह अपनी ही बातों से स्वयं को धोखा देने में समर्थ हो जाता है। ईश्वर की बहुत चर्चा करते-करते तुम्हें लगता है ईश्वर को जान लिया। इतना जान लिया ईश्वर के संबंध में, कि लगता है ईश्वर को जान लिया। लेकिन ईश्वर के संबंध में जानना ईश्वर को जानना नहीं है। यह तो ऐसा ही है जैसे कोई प्यासा पानी के संबंध में सुनते-सुनते सोच ले कि पानी को जान लिया। और प्यास तो बुझेगी नहीं। पानी की चर्चा से कहीं प्यास बुझी है! परमात्मा की चर्चा से भी प्यास न बुझेगी। और जिनकी बुझ जाए, समझना कि प्यास लगी ही न थी।
तो बुद्ध कहते हैं कि अगर जानना ही हो तो परमात्मा के संबंध में मत सोचो, अपने संबंध में सोचो। क्योंकि मूलतः तुम बदल जाओ, तुम्हारी आंख बदल जाए, तुम्हारे देखने का ढंग बदले, तुम्हारे बंद झरोखे खुलें, तुम्हारा अंतर्तम अंधेरे से भरा है रोशन हो, तो तुम परमात्मा को जान लोगे। फिर बात थोड़े ही करनी पड़ेगी।

ओशो - एस धम्मो सनंतनो - (प्रवचन- 3)-(भाग 1)

ध्यानाच्छादित अंतर्लोक में राग को राह नहीं—(प्रवचन—तीसरा)



सुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु असंवुतं।

भोजनम्हि अमत्तग्भु कुसीतं हीनवीरियं।

तं वे पसहति मारो वातो रुक्खं' व दुब्बलं।।7।।


असुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु सुसंवुतं।

भोजनम्हि च मत्तग्भु सद्धं आरद्धवीरियं।

तं वे नप्पसहति मारो वातो सेलं' व पब्बतं।।8।।


असारे सारमतिनो सारे चासारदस्सिनो।

ते सारं नाधिगच्छन्ति मिच्छासङ्कप्पगोचरा।।9।।


सारंग्च सारतो भ्त्वा असारग्च असारतो।

ते सारं अधिगच्छन्ति सम्मासङ्कप्पगोचरा।।10।।


यथागारं दुच्छन्नं वुट्टी समतिविज्झति।

एवं अभावितं चित्तं रागो समतिविज्झति।।11।।


यथागारं सुच्छन्नं वुट्टी न समतिविज्झति।

एवं सुभावितं चित्तं रागो न समतिविज्झति।।12।।

बुधवार, 29 जनवरी 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन-2) (भाग 1)


अस्तित्व की विरलतम घटना: सदगुरु




 

पहला प्रश्न



बुद्ध कहते है, वासना दुष्‍पूर है। उपनिषद कहते हैं, जिन्होंने भोगा उन्होंने ही त्यागा। आप कहते हैं, न भोगो न त्यागो वरन जागो। कृपया इन तीनों का अंतर्संबंध स्पष्ट करें।

अंतर्संबंध बिलकुल स्पष्ट है।
बुद्ध कहते हैं, वासना दुष्‍पूर है। बुद्ध वासना का स्वभाव कह रहे हैं। कोई कितना ही भरना चाहे, भर न पाएगा। इसलिए नहीं कि भरने की सामर्थ्य कम थी। भरने की सामर्थ्य कितनी ही हो, तो भी न भर पाएगा। ऐसे ही जैसे पेंदी टूटे हुए बर्तन में कोई पानी भरता हो। इससे कोई सामर्थ्य का सवाल नहीं है, पेंदी ही नहीं है तो बर्तन दुष्‍पूर है। न सामर्थ्य का सवाल है, न सुविधा का, न संपन्नता का। गरीब की इच्छाएं भी अधूरी रह जाती हैं,
अमीर की भी। दरिद्र की इच्छाएं भी अधूरी रह जाती हैं, सम्राटों की भी। सिकंदर भी उतना ही खाली हाथ मरता है जितना राह का भिखारी। दोनों के हाथ खाली होते हैं। क्योंकि, वासना दुष्‍पूर है। बुद्ध सिर्फ वासना का स्वभाव कह रहे हैं।
उपनिषद कहते हैं, जिन्होंने भोगा उन्होंने ही त्यागा। अब जो भोगेंगे, वही

वासना का स्वभाव समझ पाएंगे। दूसरे तो समझेंगे भी कैसे? वासना से दूर-दूर खड़े रहे, डरे रहे, भयभीत रहे, वासना में कभी उतरे ही नहीं, कभी वासना के उस पात्र को गौर से देखा नहीं, हाथ में न लिया जिसमें पेंदी नहीं है, तो वासना का स्वभाव कैसे समझोगे? वासना के स्वभाव के लिए वासना में उतरने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। जो उतरेगा, वही जानेगा। जो दूर खड़ा रहेगा, वंचित रह जाएगा। जो दूर खड़ा रहेगा, ललचाएगा। उसे पात्र तो दिखायी पड़ेगा, वह जो पेंदी नहीं है, वह दिखायी न पड़ेगी। और दूसरे के पात्रों में उसे यह भ्रांति रहेगी कि कौन जाने भर ही गए हों।

ओशो - एस धम्मो सनंतनो - (प्रवचन-1) - (भाग-1)

आत्मक्रांति का प्रथम सूत्र: अवैर--(प्रवचन-पहला)








मनो मृब्बड्गमा धम्मा मनो मनोमया।

मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा,

ततो नं दुक्‍खमन्‍वेति चक्कं' व बहतो पदं।।1।।



मनो पुब्‍बड्गमा धम्मा मनो मनोमया।

मनसा वे पसन्नेन भासति वा करोति बा,

ततो नं. मुनमन्‍वेति छाया' व अनपायिनी ।।2।।



अक्कोचि मै अवधि मै अजिनि मं अहसि से।

ये च तं उपनय्हन्‍ति वेरं तेस क सम्मति ।।3।।



अक्कोचि मं अवधि मै अजिनि मं अहासि में।

ये तं न उपनय्हन्‍ति वेरं तेसूपसम्मति ।।4।।



नहि वेरेन वेरामि सम्मन्तीध कुदाचनं।

अवेरेन व सम्मन्ति एस धम्मो सनंतनो।।5।।



परे च न विजानत्ति मयमेत्था यमामसे।

ये च तत्थ विजानन्ति ततो सम्मन्ति मेधगा।।6।।

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (भाग-1)

(बुद्ध की संतुलित वाणी पर दिए गए दस प्रवचनो का संकलन)




बुद्ध ऐसे हैं जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत और भी हैं, पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे। पूरी मनुष्य-जाति के इतिहास में वैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। गौतम बुद्ध ने जितने हृदयों की वीणा को बजाया है, उतना किसी और ने नहीं। गौतम बुद्ध के माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम- भगवत्ता उपलब्ध की है, उतनी किसी और के माध्यम से नहीं।