जागरण और आत्मक्रांति—(प्रवचन—अट्ठाइसवां)
पहला प्रश्न :
लोभ और लाभ का रास्ता ईर्ष्या और घृणा से, भय और दुश्चिंता से पटा पड़ा है; वह जीवन में जहर घोलकर रख देता है, ऐसा मेरे लंबे जीवन का अनुभव है। फिर भी क्या कारण है कि किसी न किसी रूप में लाभ की दृष्टि बनी ही रहती है?
लोभ से जीवन में दुख आया, लोभ से जीवन में जहर मिला, लोभ से जीवन में विपदाएं आयीं, कष्ट—चिंताएं आयीं, अगर ऐसा समझकर लोभ। को छोड़ा तो लोभ को नहीं छोड़ा। क्योंकि यह समझ ही लोभ की है।
जहां अमृत की आकांक्षा की थी, वहां जहर पाया—हानि हुई, लाभ न हुआ। जहा सुख चाहा था, वहा दुख मिला—हानि हुई, लाभ न हुआ। सोचा था चैन और सुख और शाति का जीवन होगा, दुश्चिंता से पट गया—हानि हुई, लाभ न हुआ। लोभ में हानि पाई इसलिए लोभ से छूटने चले, यह तो फिर लोभ के हाथ में ही पड़ जाना हुआ। हानि दिखाई पड़ती है लोभ की दृष्टि को।














