तप्रज्ञ, सत्पुरुष है—(प्रवचन-इक्तीसवां)
सारसूत्र:
सब्बत्थ वे सप्परिसा चजान्ति न कामकामा लपयन्ति संतो।
सुखेन फुठ्ठा अथवा दुखेन न उच्चावचं पंडिता दस्सयन्ति ।।74।।
न अत्तहेतु न परस्स हेतु न पुत्तमिच्छे न धनं न रठ्ठं ।
नइच्छेय्य अधम्मेन समिद्धिमत्तनो स सीलवा पन्जवा धम्मिको सिया ।।75।।
अप्पका ते मनुस्सेयु ये जना पारगामिनो ।
अथायं इतरा पजा तीरमेवानुधावति ।।76।।
एक प्राचीन कथा है जंगल की राह से एक जौहरी गुजरता था। देखा उसने राह में, एक कुम्हार अपने गधे के गले में एक बड़ा हीरा बांधकर चल रहा है। चकित हुआ! पूछा कुम्हार से, कितने पैसे लेगा इस पत्थर के? कुम्हार ने कहा, आठ आने मिल जाएं तो बहुत। लेकिन जौहरी को लोभ पकड़ा। उसने कहा, चार आने में दे—दे, पत्थर है, करेगा भी क्या?








