सोमवार, 30 मार्च 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो -- (प्रवचन-13)-(भाग-2)

अंतर्बाती को उकसाना ही ध्यान—(प्रवचन—तेहरवां)




सारसूत्र-



अनवस्‍सुतचित्‍तस्‍स अनन्‍वाहतचेतसो।
पुज्‍जपापपहीनस्‍स नत्‍थि जागरतो भयं।।34।।
कुम्‍भूपमं कायमिमं विदित्‍वा नगरूपमं चित्‍तमिदं ठपेत्‍वा।
योधेथ मारं पज्‍जायुधेन जितं च रक्‍खे अनिवेसनोसिया।।35।।
अचिरं वत’ यं कायो पठविं अधिसेस्‍सति।
छुद्धो अपेतविज्‍जाणो निरत्‍थं व कलिड्गरं।।36।।
दिसो दिसं यन्‍तं कयिरा वेरी व पन वेरिन।
मिच्‍छापणिहितं चितं पापियों नं ततो करे।।37।।
न तं माता-पिता कयिरा अज्‍जे वापि च जातका।
सम्‍माणिहितं चितं सेरूयसो नं ततो करे।।38।।




दुनिया है तहलके में तो परवा न कीजिए
यह दिल है रूहे-अस्र का मसकन बचाइए
दिल बुझ गया तो जानिए अंधेर हो गया
एक शमा आंधियों में है रोशन बचाइए 

बुधवार, 25 मार्च 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो--(प्रवचन-12)-(भाग-2)


उठो. तलाश लाजिम है—(प्रवचन—बारहवां)




पहला प्रश्‍न:

 
जीवन विरोधाभासी है, असंगतियों से भरा है, तो फिर तर्क, बुद्धि, व्यवस्था और अनुशासन का मार्ग बुद्ध ने क्यों बताया?

प्रश्‍न जीवन का नहीं है। प्रश्न तुम्हारे मन का है। जीवन को मोक्ष की तरफ नहीं जाना है। जीवन तो मोक्ष है। जीवन नहीं भटका है, जीवन नहीं भूला है। जीवन तो वहीं है जहां होना चाहिए। तुम भटके हो, तुम भूले हो। तुम्हारा मन तर्क की उलझन में है। और यात्रा तुम्हारे मन से शुरू होगी। कहां जाना है, यह सवाल नहीं है। कहां से शुरू करना है, यही सवाल है।
मंजिल की बात बुद्ध ने नहीं की। मंजिल की बात तुम समझ भी कैसे पाओगे? उसका तो स्वाद ही समझा सकेगा। उसमें तो डूबोगे, तो ही जान पाओगे। बुद्ध ने मार्ग की बात कही है। बुद्ध ने तुम जहां खड़े हो, तुम्हारा पहला कदम जहां पड़ेगा, उसकी बात कही है। इसलिए बुद्ध बुद्धि, विचार, अनुशासन, व्यवस्था की बात नही कि उन्हें पता नहीं है कि जीवन कोई व्यवस्था नहीं मानता।

मंगलवार, 24 मार्च 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो--(प्रवचन-11)-(भाग-2)

तथाता में है क्रांति—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)




सारसूत्र:




फन्दनं चपलं चितं दूरक्‍खं दुन्‍निवारयं।
उजुं करोति मेधावी व उसुकारो‘ व तेजनं।।29।।


वारिजो' व क्ले कित्तो ओकमोकत-उव्भतो।
परिफन्दतिदं चित्तं मारधेथ्यं पहातवे।।30।।


दुन्‍निग्‍गहस्‍स लहुनो यत्थकाम निपातिनो।
चित्‍तस्‍स दमथो साधु चितं दन्‍तं सुखावहं।।31।।


दूरड्गम एकचरं असरीरं गुहासयं।
ये चित्तं सज्जमेस्सन्ति मोक्खन्ति मारबन्‍धना।।32।।


अनवट्ठित चित्तस्स सद्धम्मं अविजानतो।
परिप्लवपसादस्स पज्जा न परिपूरति।।33।।

ओशो एस धम्मो सनंतनो भाग 2




ओशो द्वारा भगवान बुद्ध की सुललित वाणी धम्‍मपद पर दिए गए दस अमृत प्रवचनों का संकलन)

जो गीत तुम्‍हारे भीतर अनगाया पडा है। उसे गाओ। जो वीणा तुम्‍हारे भीतर सोई हुई पड़ी है छेड़ो उसके तारों को। जो नाच तुम्‍हारे भीतर तैयार हो रहा है, उसे तुम बोझ की तरह मत ढोओ। उसे प्रगट हो जाने दो। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति अपने भीतर बुद्धत्‍व को लेकर चल रहा है। जब तक वह फूल न खिले,तब तक बेचैनी रहेगी, संताप रहेगा। वह फूल खिल जाए, निर्वाण है। सच्‍चिदानंद है, मोक्ष है।

गीता में कृष्ण सारथी हैं। अर्थ है कि जब चैतन्य हो जाए सारथी, तुम्हारे भीतर जो श्रेष्ठतम है जब उसके हाथ में लगाम आ जाए। बहुत बार अजीब सा लगता है कृष्ण को सारथी देखकर। अर्जुन ना-कुछ है अभी, वह रथ में बैठा है। कृष्ण सब कुछ है, वे सारथी बने हैं। पर प्रतीक बड़ा मधुर है। प्रतीक यही है कि तुम्हारे भीतर जो ना-कुछ है वह सारथी न रह जाए; तुम्हारे भीतर जो सब कुछ है वही सारथी
तुम्‍हारी हालत उलटी है। तुम्हारी गीता उलटी है। अर्जुन सारथी बना बैठा है। कृष्ण रथ में बैठे हैं। ऐसे ऊपर से लगता है-मालकियत, क्योंकि कृष्ण रथ में बैठे हैं और अर्जुन सारथी है। ऊपर से लगता है, तुम मालिक हो। ऊपर से लगता है, तुम्हारी गीता ही सही है। लेकिन फिर से सोचना, व्यास की गीता ही सही है। अर्जुन रथ में होना चाहिए। कृष्ण सारथी होने चाहिए। मन रथ में बिठा दो, हर्जा नहीं है। लेकिन ध्यान सारथी बने, तो एक मालकियत पैदा होती है।




ओशो एस धम्मो सनंतनो भाग 2

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन- 10) (भाग 1)


देखा तो हर मुकाम तेरी रहगुजर में है—(प्रवचन—दसवां)





पहला प्रश्न:



भगवान, एक ही आरजू है कि इस खोपड़ी से कैसे मुक्ति हो जाए? आपकी शरण आया हूं।


पूछा है चिन्मय ने।
खोपड़ी से मुक्त होने का खयाल भी खोपड़ी का ही है। मुक्त होने की जब तक आकांक्षा है, तब तक मुक्ति संभव नहीं। क्योंकि आकांक्षा मात्र ही, आकांक्षा की अभीप्सा मन का ही जाल और खेल है। मन संसार ही नहीं बनाता, मन मोक्ष भी बनाता है। और जिसने यह जान लिया वही मुक्त हो गया।

साधारणतः ऐसा लगता है, मन ने बनाया है संसार, तो हम मन से मुक्त हो जाएं तो मुक्त हो जाएंगे। वहीं भूल हो गयी। वहीं मन ने फिर धोखा दिया। फिर मन ने चाल चली। फिर मन ने जाल फेंका। फिर तुम उलझे। फिर नया संसार बना। मोक्ष भी संसार बन जाता है।
संसार का अर्थ क्या है? जो उलझा ले। संसार का अर्थ क्या है? जो अपेक्षा बन जाए, वासना बन जाए। संसार का अर्थ क्या है? जो तुम्हारा भविष्य बन जाए। जिसके सहारे और जिसके आसरे और जिसकी आशा में तुम जीने लगो, वही संसार है। दुकान पर बैठे हो, इससे संसार में हो; मंदिर में बैठ जाओगे, संसार के बाहर हो जाओगे--इतनी सस्ती बातों में मत पड़ जाना।
काश, इतना आसान होता! तब तो कुछ उलझन न थी। दुकान में संसार नहीं है, और न मंदिर में संसार से मुक्ति है। अपेक्षा में, आकांक्षा में, आशा में संसार है; सपने में संसार है। तो तुम मोक्ष का सपना देखो, तो भी संसार में हो।

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन-9) (भाग-1)

यात्री, यात्रा, गंतव्य: तुम्हीं—(प्रवचन—नौवां)





सूत्र:


मा प्रमादमनुयुग्चेथ मा कामरतिसंथवं।
अप्पमत्तो हि झायंतो पप्पोति विपुलं सुखं।।24।।


पमादं अप्पमादेन यदा नुदति पंडितो।
पग्भपासादमारुयूह असोको सोकिनिं पजं।
पब्बतट्ठो' व भूमट्ठे धीरो बाले अवेक्खति।।25।।



अप्पमत्तो पमत्तेसु सुत्तेसु बहुजागरो।
अबलस्सं' व धीघस्सो हित्वा याति सुमेधसो।।26।।



अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा।
सग्जोजनं अपुं थूलं डहं अग्गी' व गच्छति।।27।।


अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा।
अभब्बो परिहानाय निब्बानस्सेव संतिके।।28।।








ढूंढ़ता फिरता हूं ऐ इकबाल अपने आपको
आप ही गोया मुसाफिर आप ही मंजिल हूं मैं

रविवार, 22 मार्च 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन- 8) (भाग 1)

प्रेम है महामृत्यु—(प्रवचन—आठवां)



 

पहला प्रश्न:



दुनिया के ज्यादातर धर्मगुरुओं ने अपने स्त्री-पुरुष संन्यासियों को हो सके उतनी दूरी रखने के नियम दिए; पर आप हमेशा दोनों के प्रेम पर ही जोर देते हैं। क्या आप प्रेम का कुछ विधायक उपयोग करना चाहते हैं? या उसकी निरर्थकता का हमें अनुभव कराना चाहते हैं?
प्रेम को समझना जरूरी है।
 
जीवन की ऊर्जा या तो प्रेम बनती है, या भय बन जाती है। दुनिया के धर्मगुरुओं ने आदमी को भय के माध्यम से परमात्मा की तरफ लाने की चेष्टा की है। पर भय से भी कहीं कोई आना हुआ है? भय से भी कहीं कोई संबंध बनता है? भय से घृणा हो सकती है, भय से प्रतिरोध हो सकता है; लेकिन भय से मुक्ति नहीं हो सकती। भय तो जहर है, फिर परमात्मा का ही क्यों न हो।

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन- 7) (भाग- 1)

जागकर जीना अमृत में जीना है—(प्रवचन—सातवां)



अप्पमादो अमतपदं पमादो मच्चुनो पदं।

अप्पमत्ता न मीयंति ये पमत्ता यथा मता।।18।।


एतं विसेसतो भ्त्वा अप्पमादम्हि पंडिता।

अप्पमादे पमोदंति अरियानं गोचरे रता।।19।।


ते झायिनो साततिका निच्चं दल्ह-परक्कमा।

फुसंति धीरा निब्बानं योगक्खेमं अनुत्तरं।।20।।



उट्ठानवतो सतिमतो सुचिकम्मस्स निसम्मकारिनो।

सग्भ्तस्स च धम्मजीविनो अप्पमत्तस्स यसोभिङ्ढति।।21।।


उट्ठानेनप्पमादेन सग्भ्मेन दमेन च।

दीपं कयिराथ मेधावी यं ओधो नाभिकीरति।।22।।


पमादमनुग्भ्न्ति बाला दुम्मेधिनो जना।

अप्पमादग्च मेधावी धनं सेट्ठं' व रक्खति।।23।।


जफर ने गाया है--

उम्रे-दराज मांगकर लाए थे चार दिन

दो आरजू में कट गए दो इंतजार में

ओशो - एस धम्मो सनंतनो (प्रवचन-6) (भाग-1)

'आज' के गर्भाशय से 'कल' का जन्म—(प्रवचन—छठवां)




पहला प्रश्न:


आपने स्त्री के लिए प्रेम और पुरुष के लिए ध्यान का मार्ग बताया। मेरी तकलीफ यह है कि न प्रेम में पूरा डूब पाती हूं, न ध्यान में गहराई आती है। कृपया बताएं मेरे लिए मार्ग क्या है?

धर्म ज्योति ने पूछा है।

धर्मगुरुओं का डाला हुआ जहर बाधा बन रहा है। उस जहर से जब तक छुटकारा न हो, प्रेम तो असंभव है। क्योंकि प्रेम की सदा से निंदा की गयी है। प्रेम को सदा बंधन कहा गया है। और चूंकि प्रेम की निंदा की गयी है और प्रेम को बंधन कहा गया है, इसलिए स्त्री भी सदा अपमानित की गयी है। जब तक प्रेम स्वीकार न होगा तब तक स्त्री भी सम्मानित नहीं हो सकती, क्योंकि स्त्री का स्वभाव प्रेम है।
और बड़े आश्चर्य की बात यह है कि स्त्रियां जितनी धर्मगुरुओं से प्रभावित होती हैं उतना कोई भी नहीं होता। और उनकी जड़ पर ही वे कुठाराघात किए चले जाते हैं।
लेकिन एक बार तुम्हारे मन में जहर फैल जाए, और ऐसा खयाल आ जाए कि प्रेम बंधन है, तो तुमने पुरुष की भाषा सीख ली। और हृदय तुम्हारा स्त्री का है। तब तुम अड़चन में पड़ो, स्वाभाविक है। पुरुष के लिए सही है यही बात कि प्रेम बंधन है। स्त्री के लिए प्रेम मुक्ति है। और जो पुरुष के लिए जहर है, वह स्त्री के लिए अमृत है। और स्त्री का तो अब तक कोई धर्म पृथ्वी पर पैदा नहीं हुआ, और स्त्रियों का तो कोई तीर्थंकर नहीं हुआ, और कोई अवतार नहीं हुआ; इसलिए स्त्री के हृदय की बात को किसी ने प्रगट भी नहीं किया।